नहाय खाय के साथ चार दिवसीय अनुष्ठान शुरू – Hindustan हिंदी

लोक आस्था का महापर्व नहाय-खाय के साथ ही शुरू हो गया। मंगलवार को जिले के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में पूरे उत्साह के साथ व्रतियों ने नहाय-खाय के लिए प्रसाद बनाया। अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू की सब्जी बनायी गयी।

इसके पहले व्रतियों ने किउल नदी में जाकर स्नान किया।

मंगलवार की सुबह पतनेश्वर घाट के अलावा अन्य घाटों पर स्नान करने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ देखी गयी। जिन जगहों पर व्रती प्रसाद बना रहे थे। उन जगहों को सबसे पहले नदी के पवित्र जल से शुद्ध किया गया। नदी में स्नान करने के बाद व्रतियों ने भगवान भाष्कर की पूजा की।

नदी के तट पर स्थानीय शहर के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहंंुचे थे। प्रसाद बनाने के दौरान महिलाएं छठी मइया की गीत गा रहीं थी। पहले-पहले हम कइली छठ मइया व्रत तोहार, करियो क्षमा छठी मइया भुलचूक गलती हमार…. आदि धार्मिक गीतों का दौर चलता रहा।

धार्मिक गीतों से शहर और गांव का वातावरण भक्तिमय बना हुआ था। शहर के 30 वार्डों के अधिकांश मुहल्लो के घरों से छठी मइया की गीत सुनाई पड़ रही थी। सुबह से ही प्रसाद बनाने के लिए लोगों ने तैयारी कर रखी थी। प्रसाद बनाने के बाद सबसे पहले व्रतियों ने भगवान भाष्कर को नमन करने के बाद प्रसाद ग्रहण किया। इसके बाद परिवार के अन्य सदस्यों के अलावा आसपास के लोगों को भी प्रसाद दिया गया। मंगलवार की दोपहर करीब दो बजे तक प्रसाद खाने का सिलसिला जारी रहा। नहाय-खाय के समापन के बाद लोग खरना की तैयारी में जुट गये हैं। बुधवार की शाम गोधूली बेला में खरना का कार्यक्रम सम्पन्न होगा।

प्रमुख घाटों पर पहुंचने लगे श्रद्धालु: नहाय-खाय संपन्न होने के बाद प्रमुख घाटों पर खरना और भगवान भाष्कर को अर्ध्य देने के लिए श्रद्धालु पहंंुचने लगे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से विभिन्न वाहनों पर सवार होकर श्रद्धालु पतनेश्वर के अलावा अन्य प्रमुख घाटों पर पहुंच रहे हैं। पतनेश्वर घाट पर सबसे अधिक श्रद्धालुओं की भीड़ होती है। स्कूल परिसर के अलावा अन्य जगहों पर व्रतियों ने अपनी जगह बना ली है। यह बता दें कि पतनेश्वर घाट के समीप ही किउल नदी के तट पर भगवान भाष्कर का मंदिर स्थापित है। जिसके कारण यहां श्रद्धालुओं की भीड़ अधिक होती है।

पर्व का अनुष्ठान करने से घरों मे आती है सुख समृद्धि: लोक आस्था का महापर्व का कई धार्मिक मान्यता है। यह पर्व इस बार 27 अक्टूबर को समाप्त होगा। बताया जाता है कि छठ महापर्व का अनुष्ठान करने से घर में सुख समृद्धि आती है। भगवान भाष्कर और छठी मइया की कृपा व्रतियों पर बनी रहती है। यह पर्व साल में दो बार होता है। बिहार, यूपी के अलावा देश के अन्य हिस्सों में भी यह पर्व मनाया जाता है। लंदन में रहने वाले राकेश सिंह बताते हैं कि उनकी पत्नी भी लंदन में छठ पर्व कर रही हैं।

माता सीता ने भी किया था छठ महापर्व:

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जब भगवान लंका पर विजयी प्राप्त कर अयोध्या लौटे थे तब माता सीता ने इस व्रत का अनुष्ठान किया था। वहीं देवासूर संग्राम के दौरान जब देवता हार गये थे तो देवताओं ने माता अदिति के पुत्र की प्राप्ति के लिए जंगलों में छठी मइया की पूजा अर्चना की थी। व्रत के अनुष्ठान से खुश होकर माता ने अदिति को पुत्र की प्राप्ति के लिए वरदान दिया था। पुन: देवासूर से संग्राम के दौरान देवताओं ने भगवान भाष्कर की आराधना की थी।

36 घंटे का रखा जाता है उपवास: खरना के बाद व्रती 36 घंटे का उपवास रखती हैं। इस दौरान पानी का सेवन भी नही करती हैं। बुधवार को श्रद्धालु खरना करेंगे। इस दिन दूध और गुड़ मिलाकर खीर बनाया जाता है। शुद्धता और पवित्रता पर पूरा ख्याल रखा जाता है। खरना के अगले दिन व्रती अस्ताचलगामी सूर्य को अर्ध्य देते हैं। इसके अगले दिन जब भगवान भाष्कर उदय होते हैं तो उन्हें अर्ध्य दिया जाता है। इसके साथ ही इस पर्व का समापन हो जाता है। उधर, झाझा में छठ मइया के परवैतिनों समेत तमाम श्रद्धालुओं ने मंगलवार को नहाय-खाय के बाद परंपरानुसार कद्दू-भात के भोजन की रश्म पूरी की। इस रश्म अदायगी के साथ ही कड़े अनुशासन व पवित्रता वाले छठ महापर्व के चार दिवसीय अनुष्ठान का मंगलवार को श्रीगणेश हो गया। बुधवार की शाम खरना के पवित्र-पावन प्रसाद के बाद गुरूवार के अपराह्न अस्ताचलगामी तथा शुक्रवार के तड़के उदयाचल के भगवान भुवन भाष्कर को अर्ध्यदान के साथ ही चार दिवसीय उक्त छठ महापर्व का पारण हो जाएगा।

इधर,मंगलवार के दिन में कद्दू-भात के प्रसाद ग्रहण के पूर्व अहले सुबह से ही झाझा के हजारों व्रतियों ने स्नान का कार्य संपन्न किया। स्नान को अहले सुबह से ही झाझा स्थित उलाय नदी के विभिन्न घाटों पर स्नान को महिला-पुरूष व्रतियों का तांता लगना शुरू हो गया था। व्रतियों की सबसे अधिक भीड़ स्थानीय गणेशी मंदिर स्थित मुख्य घाट पर जुटी थी। व्रतियों के लिए राहत व सुकून की बड़ी बात इस साल यह रही कि बीते दिनों की बारिश की वजह से उन्हें नदी में पानी बड़ी सहजता से ही सुलभ हो गया था तथा इस दफा उन्हें स्नान को ले कोई समस्या या चिंता नहीं थी। वैसे जहां पानी कुछ कम था वहां नप के पूर्व अध्यक्ष संजय सिंहा की अगुवाई में नप की एक टीम जेसीबी आदि के जरिए नदी को कुरेदकर उसके गर्भ से कुछ और पानी भी बाहर लाने की कवायउ में जुटी दिखी।

Source Article from http://www.livehindustan.com/bihar/jamui/story-four-day-rituals-begin-with-nahay-khay-1611217.html

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